अतरंगी दुल्हनिया – Part -1


ALL right reserved to Gautam Kumar [SWA MEM. ID – 40011]

उसकी ख़ूबसूरती के चर्चे दूर-दूर तक थे, गाँव के इस छोर से उस छोर तक लोग उसकी बातें किया करते थे। गठिला बदल, आसमानी आँखें, और एक दम दूध सी सफ़ेद। लोग तारीफ़ के साथ उसके क़िस्मत को भी कोसते थे और कहते थे भला किस घड़ी में ऐसी क़िस्मत लिखी होगी लिखने वाले ने कि एक सौंदर्य-स्वरूपणी को अधकच्चे पुरुष के साथ बाँध दिया।

उधर मनोहर इन सब बातों से अनजान अपनी ही धून में मग्न था। एक ख़ूबसूरत हमसफ़र के साथ ज़िंदगी शुरू करना, उनसे बातें करना और अपनी मनोभाव को व्यक्त करने के बारे में सोचा करना। माधुरी और मनोहर की शादी को महज़ एक महीना ही हुआ है और सभी उसकी तारीफ़ों के पुल बाँधा किया करते है। उनके घर के सामने से जो गुज़रता है वो रुक कर उनका हाल तो पूछ ही लेता है। एक कमरा और एक बरामदे का वो घर जिसमें उसके पिता की मृत्यु के बाद कोई नहीं आया करता था आज दिन में दस-बारह लोग तो आ ही जाते है। मनोहर ख़ुश है की उसकी हाल-ख़बर लेने इतने लोग जो आ रहे है। लोग अक्सर माधुरी से उसकी पल्लू उठाने को कहते और फिर किसी कारण से मनोहर को बाहर भेज देते थे। माधुरी चुप-चाप उनसे बातें किया करती थी, और कुछ दिनो के बाद लोग कहने लगे की मनोहर तुम्हारी बीवी को बोलने की तहज़ीब नहीं है, उसे समझाओ। मनोहर ने जब ये सुनना शुरू किया तो उसने माधुरी पर ग़ुस्सा किया और उसे घर से निकालने की धमकी देने लगा; वो रात भर सिसक-सिसक कर रोयी और फ़िर सो गयी, मनोहर पहले ही कमरे से निकल कर बरामदे में आ गया था, उसने वो रात मच्छरों संग बिताया।

सुबह मानोहर माधुरी से बात नहीं कर रहा था तो माधुरी ने उसे समझाया ये लोग सिर्फ़ माधुरी को देखने आते है और उससे गंदी-गंदी बातें करने की कोशिश करते है, उसे बहलाने की, उसे फुसलाने की कोशिश करते है। मानोहर समझने कोशिश नहीं कर रहा था और उसने कहा “मैं जनता हुँ इस गाँव के लोगों को, मुझे ज़्यादा बेवक़ूफ़ न समझो।” और वह यह कहकर पास के ही एक फ़ैक्टरी में काम करने चला गया, वह फ़ैक्टरी में कभी-कभी ही जाया करता था और दिन-दिहारी पर काम करता था, आज उसके बचपन के दोस्तों ने उसे बुलाया है। मोहन, राकेश और शिवा अक्सर उसके घर आने लगे थे, कुछ दिनो से तो लगातार और मनोहर की उनसे फिर वो दोस्ती -बचपन वाली दोस्ती शुरू हो गयी थी। पहले न मोहन, न राकेश और न ही शिवा उसके घर आया करते थे। ये तो उसके शादी के बाद उनका आना-जाना निरंतर हो गया है। बहरहाल मनोहर को इसकी ज़रा भी भनक नहीं है, वो तो बस इस बात से ख़ुश है की उसके दोस्तों ने उसे काम पर बुलाया है और वो जा रहा है।

फ़ैक्टरी में जाते ही मनोहर को सफ़ाई का काम मिल गया और वह लग गया। ऐसा तीन-चार दिन चला और फिर एक दिन शाम के वक़्त जब वो चारों वापस आ रहे तब रास्ते में उन्होंने मनोहर से कहा की भाभी अब भी हम से नाराज़ है क्या?

मनोहर: अरे कैसी बात कर रहें हो आप लोग वो तो कितना ख़ुश होती है आप सब जब आते है।

शिवा : अरे रहने दो मनोहर भाई, मुझे सब पता है, तुम सिर्फ़ हमारा दिल रखने के लिए ऐसा कह रहे हो

राकेश : हाँ, एक बात बताओ सब ठीक है तुम्हारे और भाभी के बीच

मनोहर : हाँ सब ठीक है। क्यूँ?

मोहन : नहीं छोड़ो यार इन सब बातों को

मनोहर : अरे नहीं मोहन भाई, बताने दो। हाँ राकेश भाई आपको ऐसा क्यूँ लगा की सब ठीक नहीं मेरे और माधुरी के बीच।

शिवा : अरे नहीं भाभी उदास दिख रही थी परसों इसीलिए पुछा।

मनोहर : वो मैंने डाँटा था और कहा था लोगों से अच्छे से बात करे। इसीलिए।

मोहन : अच्छा।

सभी हँसते हँसते अपने घर लौट जाते है। मनोहर आज कोशिश करता है की माधुरी को ख़ुश करने की और रास्ते से साड़ी और कंगन लेकर आ जाता है। माधुरी भी ख़ुशी के साथ स्वागत करती है।

मोहन, राकेश और शिवा का मनोहर के घर जाना और निरंतर हो जाता है। अब माधुरी और मनोहर दोनो को उन पर भरोसा करने लगते है। फिर एक दिन अचानक शिवा दौड़ता हुआ मनोहर के घर आता है और कहता है की मनोहर को एक मशीन से झटका लग गया है और वो बेहोश हो कर वही गिर गया है। माधुरी दौड़ती हुई शिवा के साथ फ़ैक्टरी की ओर बढ़ती है।

वही दूसरी तरफ़, घर से दूर स्टेशन वाले रास्ते पर, मोहन और राकेश ने मनोहर को नशे में धुत कर दिया है, और उसे कहते है की शिवा ने माधुरी को स्टेशन की तरफ़ जाते हुए देखा है और वो घर छोड़कर जा रही है। स्टेशन और फ़ैक्टरी दोनो आसपास ही थे और तीनो ने पहले ही ये योजना बना ली थी कि शिवा माधुरी को स्टेशन के रास्ते से ले जाए। मानोहर जब उसी रास्ते से माधुरी को जाते हुए देखता है तो वो भी स्टेशन की तरफ़ दौड़ता है। जब मोहन, राकेश, और मनोहर स्टेशन पहुँचते है तो देखते है एक एक्स्प्रेस चलने को तैय्यार है और राकेश मनोहर को हाथ दिखाते हुए कहता है भाभी इसी ट्रेन में गयी है और सभी उसी कोच में चले जाते है। गाड़ी चलने को तैय्यार होती और धीरे-धीरे चलने लगती है। जल्दी से भागकर मोहन और राकेश गाड़ी से उतर जाते है और गाड़ी अपनी गति पकर लेती है। मनोहर, एक कोच से दूसरे और दूसरे से तीसरे कोच में ढूँढता रहता है।

उधर रात हो जाने के कारण फ़ैक्टरी में ताला लग गया है। शिवा वहाँ बैठे गॉर्ड से पूछता है जिसे चोट लगी थी वह आदमी कहाँ गया?, गॉर्ड बताता है उसे हॉस्पिटल ले कर गये है और वो दोनो हॉस्पिटल की तरफ़ चल देते है। वहाँ जाने के बाद पता चलता है जिसे चोट लगी थी वो कोई और मनोहर था।

माधुरी घर लौट आती है, और ख़ुश थी कि वो उसका मनोहर नहीं था। घर पर ताला लगा है, एक चाभि तो मनोहर के पास भी है, इतनी रात हो गयी है, वो घर आया क्यूँ नहीं आया। मोहन और राकेश वही घर के पास ही खड़े थे, उन्होंने कहा हम तो मनोहर से मिलने आए है। “मगर मनोहर घर आए ही नहीं” माधुरी ने कहा और एक सन्नाटा सा छा गया।

थोड़ी देर बाद उसे ढूँढने सभी इधर-उधर भटकने लगे। ढूँढते-ढूँढते सभी जब स्टेशन पहुँचे तो उसका एक पुराना गमछा मिला, तो उसे माधुरी ने झट से पहचान लिया, उसे पास लेकर देखा तो उससे शराब की बदबू आ रही थी। फिर रेल्वे की पटरियों पर उसे ढूँढा वहाँ भी कुछ नहीं मिला। सुबह के सात बज चुके थे और वो मिल नहीं रहा था।सभी परेशान थे – राकेश, मोहन, और शिवा भी। माधुरी सिर्फ़ रोए जा रही थी।

“दिख रहा है अँधेरा चारों ओर न दिख रहा कोई उजाला, रोए जो सताया गया है, रोए जाए सताने वाला।।” To be Continued…..

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